कन्हैया कुमार ने आज एआईसीसी मुख्यालय में मीडिया को संबोधित किया

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कन्‍हैया कुमार ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि सबसे पहले तो आप सभी पत्रकार साथियों का हार्दिक स्‍वागत करता हूं। जैसा कि आपको मालूम है यह संवाददाता सम्‍मेलन या प्रेस कॉन्फ्रेंस दो मुद्दों को लेकर की गई है। पहला तो आप सब जानते हैं कि महाराष्‍ट्र में सरकार की मौजूदगी में सरकारी कार्यक्रम में, सरकारी लापरवाही से 11 लोगों की दर्दनाक मौत हुई है। हम भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस की तरफ से शोक संवेदना व्‍य‍क्‍त करते हैं और ये मांग करते हैं कि सरकार बिना किसी लापरवाही के, बिना किसी बहानेबाज़ी के, बिना किसी आना कानी के इसकी ज़िम्‍मेदारी ले और कुछ सवालों का जवाब दे कि जब एक सरकारी कार्यक्रम किया जा रहा था, सरकार के तमाम बड़े अधिकारी और मंत्री वहां मौजूद थे, तो इतनी बड़ी चूक, इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई?
प्रश्‍न ये उठता है कि आप किसी कंपनी को कार्यक्रम की तैयारी के लिए 13 करोड़ का ठेका देते हैं तो जब नेता के लिए टैंट लग सकता है, नेता के लिए कूलर और एसी लग सकता है तो जनता के लिए क्‍यों नहीं लग सकता है? क्‍या आपको इस बात का पूर्वानुमान नहीं था? कहते हैं कि डिजिटल इंडिया है, डिजिटल इंडिया में हर कोई अपने मोबाइल पर वैदर चेक कर लेता है। क्‍या मंत्री जी का मोबाइल काम नहीं कर रहा था? उनको आइडिया नहीं था कि देश में गर्मी पड़ती है अप्रैल में, मई में, जून में और जब गर्मी पड़ती है तो लू चलती है, गर्मी पड़ने से लोगों की तबीयत खराब होती है। जितनी क्षमता है, उससे ज़्यादा लोग अगर एक जगह इकट्ठा होंगे तो स्‍वाभाविक रूप से परेशानी आएगी। जनता की बुनियादी, बेसिक सुविधाओं का ध्‍यान नहीं रखा गया, पानी की व्‍यवस्‍था नहीं की गई, उनके लिए छाया का प्रबंध नहीं किया गया क्‍योंकि इस सरकार का पूरा ध्‍यान फोटो खिंचाने में रहता है, फोटो फ्रेम बढ़ि‍या बनना चाहिए। आप लोगों ने देखा है न? माननीय प्रधानमंत्री जी एक बड़ा सा कैमरा लेते हैं अपने हाथ में और 5 बड़े से कैमरे रहते हैं उनके पीछे जो उनका और उनके कैमरे का फोटो खींचता है।
देश में लोकतंत्र है या नहीं है? अगर देश में लोकतंत्र है, तो एक चुनी हुई सरकार एक सरकारी कार्यक्रम कर रही है और वहां लोगों को यदि बुलाया गया है, उनके साथ अगर कोई हादसा होता है तो इसकी ज़िम्मेदारी सरकार को लेनी पड़ेगी। भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस की महाराष्‍ट्र यूनिट ने यह सवाल उठाया है कि ये गैर इरादतन हत्‍या का मामला है, सरकार इसकी ज़िम्मेदारी ले और उसकी ज़िम्मेदारी तय करने के लिए देश का सबसे महत्‍वपूर्ण विपक्ष होने के नाते हम सरकार से ये सवाल उठा रहे हैं कि आप घटना के बाद बहानेबाज़ी न करें, इधर-उधर की बात न करें, ज़िम्मेदारी तय करें, जो लोग दोषी हैं उनके ऊपर कार्रवाई करें और सबसे ज़्यादा दोषी तो सरकार खुद हैं तो ये दोष को अपने मत्‍थे ले और इस तरह की कोई भी घटना आने वाले दिनों में न हो, इसको सुनिश्‍चित किया जाए, यह भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस की तरफ से हमारी मांग है।
दूसरा जो महत्‍वपूर्ण विषय है, जिसके बारे में आप सब लोगों को सूचित भी किया गया होगा कि कल आदरणीय राहुल जी ने कर्नाटक की एक सभा में यह मांग उठाई है कि सरकार अगर सचमुच ओबीसी से प्रेम करती है क्‍यों‍कि आप सब जानते हैं पिछले दिनों आप लोगों ने देखा कि विपक्ष मांग रहा था जेपीसी, सारे विपक्षी दलों ने कहा- जेपीसी, जेपीसी, जेपीसी, अचानक से बीजेपी ने कहना शुरू कर दिया- ओबीसी, ओबीसी, ओबीसी। जेपीसी की मांग के सामने अगर ओबीसी की बात बीजेपी लेकर के आई है, तो यह जरूरी हो जाता है कि कुछ सवाल सरकार से पूछे जाएं।
सबसे पहला सवाल ये है कि प्रधानमंत्री बड़े जोर-शोर से कह रहे हैं कि डिजिटल इंडिया का दौर है तो डिजिटल इंडिया में, डिजिटल दौर में सबसे जरूरी चीज़ है डेटा। अक्‍सर आप सब लोग सुनते होंगे, कहा जा रहा है कि ‘डेटा न्‍यू ऑयल’ है। जिसके पास डेटा होगा, वो दुनिया का लीडिंग पावर होगा। अगर ऐसी स्थिति है, तो हमारी सरकार, भारत की सरकार डेटा को इकट्ठा करने में, डेटा को तैयार करके, डेटा देश को बताने में, जारी करने में इतनी हिचकिचाहट क्‍यों दिखा रही है? क्‍या कारण है इसका?
आप सब जानते हैं कि जब भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस की सरकार थी यूपीए– 2 के दौर में 2011 में जनगणना हुई और उस जनगणना की जो रिपोर्ट थी, उसको तैयार किया गया, वह रिपोर्ट प्रकाशित होती, उसके बाद सरकार चली गई। 2014 में नई सरकार बनकर आई। तब से लेकर हम लोग 2023 में हैं, अभी तक कोई डेटा जारी नहीं किया गया है, आप सब लोगों को पता है कि 2021 में जनगणना होनी थी, 2021 में जनगणना नहीं हुई है।
दुष्‍यंत कुमार कहता हैं कि ‘कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए, कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए’। डेटा जब इतना महत्‍वपूर्ण हैं, जब हर चीज़ को गिना जाना जरूरी है, आप स्‍त्री गिनते हैं, पुरुष गिनते हैं, शिशु गिनते हैं, पशु गिनते हैं तो जाति गिनने में क्‍या दिक्‍कत है और हम इसमें कुछ और तो नहीं कह रहे हैं, हम ये कह रहे हैं कि देश में हर 10 साल में जो सामाजिक, आर्थिक और जातीय आधार पर जो जनगणना होती है, उसकी रिपोर्ट आप जारी कीजिए।
जो जनगणना 2021 में होनी थी, 2023 हो रही है, तो आप उस जनगणना की कार्रवाई को शुरू कीजिए, क्‍योंकि हर 10 साल में जनगणना होनी है और ऐसा तो है नहीं कि आज जनगणना शुरू हुई है। आप सब जानते हैं कि इस देश में लगभग 150 साल से जनगणना हो रही है और हम गिनते क्‍यों हैं? हमको संख्‍या को गिनने की ज़रूरत क्‍यों पड़ती है? इसका सीधा सा जवाब है। आपके घर में जितने सदस्‍य होते हैं, उतना ही खाना बनाते हैं न। घर में अगर आप कोई दावत देते हैं, तो जितने गेस्‍ट आपको एक्‍सपेक्‍टेड होते हैं, उतना ही आप भोज में खाना बनवाते हैं। जब आपके पास संख्‍या ही नहीं होगी तो किस आधार पर आप नीति का निर्माण करेंगे, कैसे आप नीति का निर्धारण करेंगे? संख्‍या होना जरूरी है और संख्‍या के मामले में आप सब लोगों को पता है, न सरकार इस बात को बताने में इंट्रेस्‍टेड है कि अडानी जी की शैल कंपनी में 20,000 करोड़ रुपए कहां से आए, न सरकार इस बात को बताने में इंट्रेस्‍टेड है कि इस देश की वास्‍तविक संख्‍या क्‍या है?
आप अगर प्रधानमंत्री जी की रैली को भी ध्‍यान से सुनेंगे, तो कुछ दिन पहले कह रहे थे- 135 करोड़, 135 करोड़, आज-कल कहते हैं- 140 करोड़। तो 135 करोड़ से 140 करोड़ हम कैसे हो गए हैं? क्‍या सचमुच 140 करोड़ हुए हैं, कि 139 करोड़ ही हो रहे हैं? ये आंकड़ा तो सरकार को इकट्ठा करना चाहिए, सरकार को ये आंकड़ा जारी करना चाहिए और जब गिन ही रहे हैं, पेड़ गिन लेते हैं, पशु गिन लेते हैं, शिशु गिन लेते हैं, तो जाति भी गिन लीजिए।
देश को आखिर पता तो चले कि किस वर्ग के लोगों की वास्‍तविक हालत क्‍या है? ये भी तो हो सकता है न, सरकार ने ही किया है कि इस देश में 10 परसेंट ईडब्‍लूएस के आधार पर रिज़र्वेशन दिया है और कांग्रेस पार्टी ने, भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस ने उसका समर्थन किया कि अगर आपके पास ये आंकड़ा है कि जनरल कैटेगरी के लोग भी गरीब हैं, आप उनको मदद देना चाहते हैं तो मदद दीजिए। सरकार यह भी डेटा इकट्ठा करती है कि गरीबी रेखा से नीचे कितने लोग रहे हैं? इसके आधार पर आप बीपीएल कार्ड जारी करते हैं, इसके आधार पर आप उनको खाद्यान्न सुरक्षा देते हैं, इसके आधार पर आप प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उनको घर बनाकर देते हैं, तो किसी भी सरकार के लिए आंकड़ों का होना ज़रूरी है।
प्रश्‍न ये है कि आंकड़ा क्‍यों छुपाया जा रहा है? और आप सबने देखा कि किस चालाकी से यह काम किया जाता है। राहुल जी ने चोर को चोर कहा। अब बताइए चौ को चौ नहीं कहेंगे तो सौ कहेंगे? चोर को चोर ही तो कहा था, तो इन्‍होंने कह दिया कि ओबीसी का अपमान कर रहे हैं। प्रधानमंत्री अपनी रैलियों में जाकर कहते हैं कि मैं ओबीसी से आता हूं। ये इस बात को सुनिश्चित करेगा कि अब सरकारी विभाग में कोई भी पोस्‍ट खाली नहीं होगी, जितने विभाग में रिक्तियां हैं, सारी रिक्तियां भर दी जाएंगी, लेकिन रिक्तियां भरने से पहले यह जानकारी तो हो कि इस देश में लोगों की वास्‍तविक हालत क्‍या है? उनकी सामाजिक स्थिति क्‍या है? उनकी आर्थिक स्थिति क्‍या है? उनकी जातीय स्थिति क्‍या है? जाति के आधार पर राजनीति करेंगे, जाति के आधार पर वोट लेंगे, जाति के आधार पर विपक्ष को घेरने का प्रयास करेंगे, लेकिन जाति की संख्‍या क्‍या है, ये बताने की बात नहीं कर रहे हैं और हम गिनने की ही बात कर रहे है न, गिनने में क्‍या तकलीफ है?
कहते हैं कि किसी भी राज्‍य का निर्माण कैसे होता है – तीन चीज़ों से होता है संख्‍या, ज़मीन और संप्रभुता तो संख्‍या तो पता होना चाहिए न कि भारतीय राज्‍य की सीमाओं के भीतर कितने भारतीय रहते हैं? उनकी वास्‍तविक हालत क्‍या है? चाहे वो किसी भी वर्ग से आते हो। आज तो कोई भी ये नहीं कह सकता न कि रिज़र्वेशन नहीं मिल रहा है, आज तो सबको रिज़र्वेशन मिल रहा है, आज तो जनरल कैटेगरी को भी रिज़र्वेशन मिल रहा है, ओबीसी को भी मिल रहा है, एससी को भी मिल रहा है और एसटी को भी मिल रहा है।
तो बीजेपी को यह बात स्‍पष्‍ट करनी चाहिए और आरएसएस के प्रमुख का कई बार आप लोग बयान सुन चुके होंगे, वो कहते हैं कि हम (भाजपा) रिव्‍यू करना चाहते हैं, रिज़र्वेशन पॉलिसी का हम रिव्‍यू करना चाहते हैं। तो बिना डेटा के आप रिव्‍यू कैसे करेंगे? जब आपके पास आंकड़ा ही नहीं होगा तो आप क्‍या रिव्‍यू करना चाहते हैं? इसका मतलब ये है कि बीजेपी असल चाहती है कि ‘गुड़ खाएं, गुलगुले से परहेज’ मतलब एक वर्ग को कह दें कि नहीं-नहीं गिनने की क्‍या ज़रूरत है, इससे समाज में जात-पात फैलेगा, समाज में जातिवाद बढ़ेगा, अगर ओबीसी बोलने से समाज में जात-पात फैलता है तो प्रधानमंत्री अपनी रैली में जाकर ये क्‍यों कहते हैं कि मैं ओबीसी हूं। विपक्ष जब जेपीसी की मांग करता है, जब राहुल जी चोर को चोर कहते हैं तो सरकार क्‍यों कहती है कि आप ओबीसी का अपमान कर रहे हैं? अगर यह शब्‍द बोलने से, यह शब्‍द कहने से, इसको गिनने से समाज में जात-पात फैलता है, तो बीजेपी इसके आधार पर राजनीति क्‍यों करती है? बीजेपी को अपना स्‍टैण्‍ड क्‍लीयर करना चाहिए, बीजेपी को देश की जनता को जाकर बताना चाहिए कि आप जनगणना कराना चाहते हैं कि नहीं कराना चाहते हैं और आप जनगणना कराना चाहते हैं तो कराईए, जैसे बिहार में हो रहा है, अगर आप नहीं कराना चाहते हैं तो भी प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करके देश को बताईए कि हमको देश के लोगों को गिनने की ज़रूरत नहीं है, सरकार को लोगों को गिनने की ज़रूरत नहीं है, उनका दोस्‍त जो है न वो डेटा इकट्ठा कर रहा है, जिसके आधार पर वो चुनाव की नीति बना लेंगे, लेकिन सवाल यहां सरकार की नीति निर्धारण का है।
कितने लोग किस घर में रहेंगे, उसी के आधार पर आप कमरा बनवायेंगे न। एक बेडरूम बनवाएंगे, बच्‍चा हो गया है तो एक चिल्‍ड्रन रूम बनवाएंगे, गेस्‍ट आते हैं तो एक गेस्‍ट रूम बनवाएंगे। किसी भी नीति का निर्माण आप डेटा के आधार पर करेंगे, सरकार डेटा जारी नहीं करना चाहती है और यह सवाल राहुल जी ने उठाया है जो आज के लिए बहुत जरूरी सवाल है और अगर आपको प्रेम है, जो आप दावा करते हैं और अपनी रैलियों में जाकर बताते हैं तो देश को बताइए कि देश में जाति के आधार पर लोगों की वास्‍तविक स्थिति क्‍या है? लोगों को बताइए कि आर्थिक आधार पर लोगों की स्थिति क्‍या है? सामाजिक आधार पर लोगों की स्थिति क्‍या है? इसका डेटा इकट्ठा कीजिए, जनगणना करवाइए, उसका डेटा को जारी कीजिए, तब जाकर पता चलेगा न कि दुनिया में डंका बज रहा है जिस देश का, उस देश की असली हालत क्‍या है?
हम भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस की तरफ से यह मांग करते हैं और हमारे राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे साहब ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है, उस चिट्ठी में यह ज़िक्र किया है कि हमने दोनों सदन में इस बात को उठाया है कि 2011 में जो जनगणना हुई थी उसकी रिपोर्ट को आप जारी कीजिए, 2021 में जो जनगणना होनी थी, उस जनगणना को अविलंब शुरू कीजिए और जब एक काम हो रहा है, एक पंथ दो काज हो जाए। जब गिन ही रहे हैं तो सब आधार पर गिन लीजिए, जब हर आधार पर समाज में लोग रह रहे हैं तो हर आधार पर लोगों को गिन लीजिए और सरकार के पास डेटा होना जरूरी है, सरकार अगर कहती है कि देश में खुशहाली है, देश में खुशहाली आई है, लोगों के बीच में प्रोसपेरिटी फैली है तो यह बताने में क्‍या दिक्‍कत है कि देश में कितने बेरोजगार हैं।
आप सब लोग इस बात को जानते है कि सरकार ने सर्वे कराना बंद कर दिया है, सरकार के पास बेरोजगारों का कोई आंकड़ा नहीं है, क्‍योंकि सरकार रोजगार देने में इंट्रेस्‍टेड ही नहीं है, इसीलिए वो बेरोजगारों को गिनने के लिए तैयार नहीं है। भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस की तरफ से यह स्‍पष्‍ट और सीधी मांग है और अविलंब जनगणना करवाई जाए और जनगणना तीनों आधार पर जिस तरीके से 2011 में हुई थी सामाजिक, आर्थिक और जातीय आधार, तीनों आधार पर जनगणना हो, अगर बिहार सरकार जाति की जनगणना करवा सकती है तो देश की सरकार भी करवा सकती है और यह देश के लोगों का संवेधानिक, बुनियादी अधिकार है कि उनको पता चले कि उनकी वास्‍तविक स्थिति क्‍या है? आप लोगों ने बड़े धैर्य से हमको सुना, आपके जो प्रश्‍न होंगे उसका भी हम धैर्य से जवाब देने की कोशिश करेंगे।
बहुत-बहुत शुक्रिया!
बहुत-बहुत धन्‍यवाद!
जातीय मतगणना के आधार पर पूछे एक प्रश्न के उत्तर में श्री कन्हैया कुमार ने कहा कि मैंने कहा कि इस देश में सभी वर्ग को रिज़र्वेशन मिल रहा है, जनरल को भी मिल रहा है, ओबीसी को भी मिल रहा है, एससी को भी मिल रहा है, एसटी को भी मिल रहा है, तो इस देश के अंदर रहने वाले जो लोग हैं, उनकी हर जगह भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए और ये बात जो है, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरुरी है। आप इसको सिंपली बैलगाडी़ के उदाहरण से समझ सकते हैं-
दो बैल एक बैलगाड़ी को खींचते हैं। एक बैल अगर बायां चले और दूसरा बैल दायां चले तो गाड़ी तो आगे नहीं बढ़ेगी। समाज में अगर आप संतुलन चाहते हैं, तो जिसकी जितनी संख्या है, उसको उतना हक आपको सुनिश्चित करना पड़ेगा। अभी तक हम सामाजिक, आर्थिक और जातीय आधार पर जनगणना की बात कर रहे हैं। 50 प्रतिशत महिला भी तो है, कब तक हम लोग इस बात को दबाते रहेंगे। आधी आबादी को कब तक उनके हक से हम लोग महरुम रखेंगे। ये जो सवाल है, इसको आप एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग के खिलाफ किया जाने वाला किसी कार्य के रुप में मत देखिए। इसको आप ऐसे देखिए कि किसी भी राज्य के लिए, उस राज्य के भीतर रहने वाले जो लोग हैं, उनकी वास्तविक स्थिति का पता होना चाहिए। ये सीधी सी बात है। राहुल गांधी जी ने वो कहा है, वो राहुल गांधी जी ही आज कह रहे हैं। आप जानते हैं कि इस देश में 30-40 साल से ये बात कही जा रही है। मेरे ख्याल से आप उत्तर प्रदेश गए हैं, उत्तर प्रदेश में एक बड़े नेता हुए, माननीय काशीराम जी। उन्होंने ये नारा दिया था, ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ और हम कह क्या रहे हैं, क्या कहती है बीजेपी। बीजेपी तो बार-बार बहुसंख्यक-बहुसंख्यक ही बोलती है ना, किस आधार पर बोलती है? क्योंकि इस देश में गणना हुई है, गिनती से हमें पता चला है। योगी जी इसी आधार पर 80-20 कर रहे हैं ना, क्योंकि वह गणना हुई है, आप यह बात बोल रहे हैं और अगर ऐसा होता है, कि जिसकी जितनी संख्या है, किसी के साथ यह अन्याय नहीं है।
तो राहुल जी ने इस आधार पर यह कहा है कि अगर आप लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं, तो लोगों को उनकी संख्या के अनुपात में आपको हक देना पड़ेगा और ऐसा जो है, राहुल जी से बोल नहीं रहे हैं, मैं कांग्रेस पार्टी के द्वारा हाल के दिनों में लिए गए कुछ फैसलों की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं – पिछले दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तरफ से हुआ। एक उदयपुर का चिंतन शिविर और दूसरा रायपुर का महाधिवेशन। दोनों ही जगह ये बात कही गई कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। हर पांचवा नौजवान दुनिया का भारतीय है। तो अगर आप कोई नीति बना रहे हैं, तो आप युवाओं को नज़रअंदाज़ करके नहीं बनाएंगे। इसलिए 50 अंडर 50 की पॉलिसी लेकर आया गया है। इसको आप सिर्फ कास्ट के फ्रेमवर्क में मत देखिए। इसमें जाति भी है, वर्ग भी है, लिंग भी है, आमदनी भी है और हर तरह की पहचान है।
तो हमारी सिंपल और सीधी सी बात है कि सरकार को आंकड़ा इकट्ठा करना चाहिए। सरकार के पास आंकड़ा होना चाहिए, ताकि सरकार जब नीति निर्माण करे, तो उसको नीति निर्माण करने में सुविधा होगी और आप जानते हैं कि भारतीय सांख्यिकी आयोग, आजकल उसके पास करने के लिए कुछ नहीं है। ना इकोनॉमिक सर्वे करा रहे हैं, ना अनएम्प्लॉयमेंट का डेटा इकट्ठा कर रहे हैं, ना जनगणना करवा रहे हैं, ना उनकी संख्या जारी कर रहे हैं, तो पॉलिटिकल स्लोगन में यह सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है, देश आगे बढ़ रहा है, कितना आगे बढ़ा है?
ऐसा नहीं हो सकता है ना, आपको हम बोलें कि केला लेकर आइएगा, तो आप पूछेंगे ना कि कितना? आधा दर्जन कि एक दर्जन? तो जितना हमें ज़रूरत होगी, उसके हिसाब से बोलेंगे। डेटा को लेकर इतनी रिलक्टेंसी, इतनी हिचकिचाहट सरकार के मन में क्यों है? तो राहुल जी ने प्रश्न सीधा-सीधा उठाया है कि एक तो हमने 2011 में जनगणना कराई थी, तीनों आधार पर कराई थी। अगर आपको प्रेम है, तो पहले तो आप 2011 का ही डेटा रिलीज़ कर दीजिए।
दूसरा, हर 10 साल में जो जननगणना होनी है, उसको कराइए, पहले ही दो साल लेट हो गई है और अगर जब करा ही रहे हैं, तो एक ही खर्चे में हो जाएगा। जैसे आपके घर पर आएंगे गिनने के लिए, तो आपको भी गिन लेंगे, आपके घर की महिला को गिन लेंगे, बच्चे को भी गिन लेंगे और आप कौन सी जाति के हैं, ये भी गिन लेंगे। आपके घर में कितना सिलेंडर है? आपके रूम कितने हैं? आप कौन सी गाड़ी इस्तेमाल करते हैं? आपकी इकोनॉमिक हालत क्या है? इसको भी गिन लेंगे। जितना हमारे पास वैरिएशन ऑफ डेटा रहेगा, जितना हमारे पास डेटा रहेगा, उतनी आसानी होगी हमें पॉलिसी बनाने में। तो अननैसेसरी इसमें कोई पॉलिटिकल मीनिंग नहीं ढूंढना चाहिए। ये राज्य की ज़िम्मेदारी है और जनता का अधिकार है।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री कन्हैया कुमार ने कहा कि क्यों नहीं सफल होगा, आज के समय में, डिजीटल दौर में क्या-क्या चीज़ की जनगणना हो जाती है। आप अपने मोबाईल के सामने बोलिएगा, जूता, उसके बाद प्रचार आना शुरू हो जाएगा, दो मिनट के बाद। एआई के इस दौर में किसी चीज़ को क्लासिफाई करना, डेटा को इकट्ठा करना इतना मुश्किल काम तो नहीं है। यही तो हमने कहा महाराष्ट्र के मामले में भी। अरे गृहमंत्री मोबाईल पर ये देख लेते कि आज का वैदर क्या है, अगर हीट वेव आने की संभावना है, तो कार्यक्रम दोपहर की जगह शाम को हो जाता।
आज जो आप जटिलता का प्रश्न उठा रहे हैं ना, उस जटिलता को टैक्नॉलोजी ने रिजॉल्व कर दिया है। अब आप किसी भी कॉर्पोरेट ऑफिस में चले जाइए, सारा डेटा है उनके पास। किसी भी कॉर्पोरेट कंपनी के पास चले जाइए, सारा डेटा है उनके पास। आपकी जो उम्र है ना, उसी के हिसाब से आपको एड आएगा और आप जो देखेंगे, उसी के हिसाब से आपको वीडियो भी आएगा। आज की डेट में ये कोई मुश्किल काम नहीं है। सरकार अगर चाहेगी डेटा इकट्ठा करना, तो जो जनगणना होगी, उस जनगणना में जो लोग पूछने के लिए जाएंगे घर-घर, वो सब सवाल पूछ लेंगे।
वो पूछ लेंगे आप किस तरह के राजपूत हैं, किस तरह के ब्राह्मण हैं, किस तरह के यादव हैं। 3, 13, सवा लाख, 13 लाख कुछ ऐसे हैं ना। कितने प्रकार के ब्राह्मण हैं, कितने प्रकार के भूमिहार हैं, कितने प्रकार के राजपूत हैं, कितने प्रकार के यादव हैं, सब गिना जा सकता है और हम क्यों ये बात उठा रहे हैं- हम इसलिए ये बात उठा रहे हैं कि देश के पास, सरकार के पास देश के लोगों की पूरी जानकारी होनी चाहिए। अगर आप देश में इंट्रस्टेड़ हैं तो।
अगर आप देश का नाम लेकर दोस्त में इंट्रस्टेड़ हैं, तो वो अलग बात है कि देश जो है, उसकी स्थिति ये हुई कि 50 प्रतिशत लोगों की 40 प्रतिशत आमदनी घट गई और प्रधानमंत्री जी के दोस्त की आमदनी बढ़ गई। वो दुनिया के दूसरे, तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति बन गए। अगर सिर्फ इसी डेटा से मतलब है, तो अलग बात है। अगर देश के 140 करोड़ लोगों के बारे में डेटा इकट्ठा करना है, उसकी डीटेल जाननी है, ताकि इनके लिए कुछ अच्छा किया जा सके। हो सकता है आप जिसको इंदिरा आवास दे रहे हैं, उसको इंदिरा आवास की ज़रूरत ही ना हो। जिसको ज़रूरत है, आप उसको नहीं दे रहे हैं, उसको नहीं गिन रहे हैं। तो ये किसी के खिलाफ नहीं है। ये असल में सबका साथ, सबका विकास है।
जाति गणना पर पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री कन्हैया कुमार ने कहा कि एक बात तो ये है कि आप बिल्कुल पूछिए, आपका हक है। आप सवाल पूछिए, हम जितना भी जवाब दे सकते हैं, हम देंगे। एक तो ऐसा नहीं है कि आज कर रहे हैं, अगर आप मेरी ही प्रेस वार्ता को देखेंगे ना, बाकी और किसी का नाम नहीं ले रहे हैं, तो 31 तारीख को सूरत में जब हम प्रेस वार्ता करने के लिए गए थे, इस सवाल को उठाया था। राहुल जी भी बोल रहे हैं, इससे पहले कैप्टन अजय जी ने यहीं से प्रेस वार्ता की थी और हम ये कह रहे हैं कि 2011 में हमने ये सर्वे कराया। ये सर्वे है, हमने ये सर्वे कराया, जनगणना एक प्रकार का सर्वे है, हमने ये सर्वे कराया और रिपोर्ट तैयार होते-होते हमारी सरकार चली गई, ठीक है। फिर ड्यू डेट जो थी, वो 2021 थी। तो 2021 में सरकार ने कहा कि कोविड के चलते हम नहीं करा रहे हैं।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री कन्हैया कुमार ने कहा कि आपको सर मैं चिट्ठी दे देता हूं खरगे जी की। हमने ये सवाल उठाया है और इस सवाल पर कोई If, But नहीं करनी है। अगर हमें नहीं कराना होता, तो 2011 में ही नहीं कराते। सीधी सी बात है।
विपक्षी एकता पर पूछे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री कन्हैया कुमार ने कहा कि अच्छा विपक्षी एकता पर एक अलग प्रेस वार्ता की जाएगी। नहीं, सिर्फ विपक्षी एकता की बात नहीं है, ये देश की एकता की बात है। हम तो चाहते हैं कि भाजपा भी इसमें हमारे साथ आए और एक प्रेस वार्ता करके भाजपा के प्रवक्ता बताएं कि वो देश के लोगों को गिनना चाहते हैं कि नहीं, हम सिर्फ विपक्ष को ही यूनाइट नहीं करना चाहते। 140 करोड़, जैसा कि प्रधानमंत्री अपना रैली में बोलते हैं, तो हम एग्जैक्टली जानना चाहते हैं कि हम 140 करोड़ हुए हैं कि नहीं हैं। तो हम चाहते हैं कि देश की एकता बने, सिर्फ विपक्षी एकता नहीं, भाजपा भी इसमें शामिल हो और अपना स्टैंड देश के सामने क्लीयर करे कि वो जनगणना कराना चाहती है कि नहीं कराना चाहती है और अगर कराना चाहती है तो वो सामाजिक, आर्थिक और जातीय आधार पर लोगों को गिनेगी की नहीं गिनेगी? एक लाइन में जब आप स्त्री गिन सकते हैं, पुरुष गिन सकते हैं, पशु गिन सकते हैं, शिशु गिन सकते हैं, तो ओबीसी क्यों नहीं गिन सकते हैं?

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