डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, सांसद और एआईसीसी प्रवक्ता ने आज एआईसीसी मुख्यालय में मीडिया को संबोधित किया

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डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि दोस्तों, ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज एक निर्णय आया है, कनविक्शन को निलंबित नहीं किया गया है। ये सभी जो मूलभूत आधार हैं कानून के क्षेत्र के, उनके अनुसार ये गलत है। एक गलत निर्णय को अफर्म किया गया है, वो गलत है। हमारे पास जितने भी कानूनी विकल्प हैं, प्राथमिक जिसमें हैं उच्च न्यायालय की तरफ जाना, उसके अधिकार क्षेत्र का हम उपयोग करेंगे। निकट भविष्य में करेंगे। इसमें तिथि देना आवश्यक नहीं है, लेकिन हमारे सभी अधिकार क्षेत्र जल्द से जल्द इस्तेमाल किए जाएंगे।

आप जानते हैं कि हमारे जो संवैधानिक न्यायालय हैं, जिसमें उच्च न्यायालय भी आता है, जिसमें उच्चतम न्यायालय भी आता है, उनके पास व्यापक ऐसी पावर्स हैं, जिनके अंतर्गत ये जो गलत कारणों से, गलत कानूनी आधार पर दो निर्णय आए हैं, उनको चुनौती दी जाएगी और हमें आशा और विश्वास है कि जल्द से जल्द ये सही की जाएगी। गलती को ठीक किया जाएगा न्यायिक कानूनी रूप से।

जहाँ तक श्री राहुल गांधी के वक्तव्य का सवाल है, सब जानते हैं कि वो एक लाइन के संदर्भ के परिपेक्ष्य में कही गई थी। किस प्रकार से उसको तोड़- फोड़ कर एक नया आयाम दिया गया है, जो बिल्कुल सीधा देखने पर भी झूठा और बेईमानी दिखता है। जो कारण दिए गए हैं इस निर्णय में, वो बिल्कुल संदिग्ध हैं, गलत हैं कानूनी रूप से मैं कह रहा हूं और जो बार-बार ओबीसी के विषय में टिप्पणियां की जा रही हैं, उनका उल्टा असर अब हो रहा है। सभी लोग समझते हैं कि ओबीसी समुदाय के लोगों ने ये समझ लिया है कि मोदी जी और सत्तारुढ़ बीजेपी किस प्रकार से उनके नाम का दुरूपयोग कर रहे हैं। उनके नाम को भुनाने का प्रयत्न कर रहे हैं, राजनीतिक रूप से।

दो वर्ष का मैक्सिमम दंड देना, जो कभी सुना नहीं गया, कभी नहीं हुआ मानहानि के क्षेत्र में, कनविक्शन ही नहीं होता क्रिमिनल, अगर होता है, तो तीन या पांच महीने से ज्यादा कभी सुना नहीं गया। उसको सेशन कोर्ट द्वारा सही मानना बिल्कुल गलत है। इससे अगर कोई भी समझता है कि राहुल गांधी की आवाज रुकेगी, झुकेगी, साइलेंट होगी, तो वो ना राहुल गांधी को जानते हैं, ना कांग्रेस को समझते हैं।

राहुल गांधी स्पष्ट और सही रूप से बोलते हैं। वो लोगों के, जनता-जनार्दन के न्यायालय में, उनके दरबार में बोलते हैं और उन्होंने कुछ गलत ना कहा है, ना कहेंगे, पर अपनी आवाज पुरजोर तरीके से सबके सामने रखेंगे। उनके पीछे पड़ना, उनको कभी ट्रोल करना, उनके संसद में बोलने से पहले प्री कंडीशन रखना, संसद को सत्तारुढ़ पार्टी द्वारा अवरुद्ध करना, उनकी सदस्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाना, उनको प्रिवलेज कमेटी से डराना-धमकाना, इन सभी से ना कुछ फर्क पड़ा है, ना पड़ेगा, ना कांग्रेस पार्टी को, ना राहुल गांधी जी को।

जो उनके कानूनी अधिकार क्षेत्र हैं, जो संवैधानिक अधिकार क्षेत्र हैं, उन सबका वो प्रयोग करते रहेंगे और इस जरिए जो चिंता दिखा रहे हैं माननीय मोदी जी, बीजेपी सरकार, सत्तारुढ़ पार्टी, वो सिर्फ एक चीज दिखा रहे हैं, वो चिंता व्यक्त कर रहे हैं, घबराहट और बौखलाहट व्यक्त कर रहे हैं इस प्रकार के हथकंडों से। ना कि राहुल गांधी जी के जनहित में पूछे गए इतने सारे अलग-अलग प्रश्नों का उत्तर देना भ्रष्टाचार से संबंधित बहुत पेनी दृष्टि से पूछे गए प्रश्न इत्यादि।

अब मैं दो-चार मिनट लूंगा आपके साथ, मैं तकनीकी नहीं होना चाहता, लेकिन आपको छोटी सी एक झांकी देना चाहता हूं कि किस प्रकार से पढ़ने-दिखने में भी ये निर्णय गलत लगता है, जो आज आया है और मैं जानता हूं कि मैं जनता से बात कर रहा हूं आपके जरिए, जर्नलिस्ट से बात कर रहा हूं, मैं कोई कानून की बहस नहीं कर रहा हूं। लेकिन जब निर्णय आता है, तो  निर्णय में आवश्यक हो जाता है कि कुछ ना कुछ डिटेल में जाया जाए।

अगर आप कुछ तीन-चार पैरा देखें शुरू के, तो विचित्रता इस केस में बड़ी अजीब है-  केस के बाद केस यानी पुराने निर्णय लिखे गए हैं, साइट किए गए हैं, जो पढ़ने से भी मालूम पड़ता है कि गलत साइट किए गए हैं। जो लागू नहीं होते या लागू हमारे पक्ष में होते हैं यानी राहुल गांधी जी के पक्ष में या अनुपयुक्त हैं, उनका दुरूपयोग या इस्तेमाल किया गया है निर्णय पर आने के लिए। मैं उदाहरण दूं कुछ आपको। एक पन्ने पर, पन्ने 4 पर, मैं डिटेल में नहीं जाना चाहता- केस साइट किया गया है और इन सब केसेस में सिलेक्टिवली आंशिक रूप से कोटेशन दिए गए हैं, व्यापकता नहीं देखी गई है। एक सरीन का केस उच्चतम न्यायालय का साइट किया है माननीय न्यायाधीश का, जिनका निर्णय आज आया है और उसमें ये लिखा है कि If so, the legal position can be laid down that when conviction is on corruption charge against a public servant, the court should not suspend the order of conviction. अब ये अंडरलाइन किया गया है माननीय सेशंस जज द्वारा, अंडर लाइन किया गया है, सिर्फ इन्हीं हिस्सों पर रिलाय किया गया है। क्या ये करप्शन चार्ज का केस था? राहुल गांधी जी क्या करप्शन चार्ज में संदिग्ध हैं या अभियुक्त हैं?

दूसरा उदाहरण दिया नवजोत सिंह सिद्धू का। याद रहे, वैसे नवजोत सिद्धू केस में मर्डर चार्ज था, उसको अंडर लाइन किया गया है। मैं सिर्फ अंडर लाइन पोर्शन पढ़ रहा हूं निर्णय के और ये अंडर लाइनिंग मेरी नहीं, प्रिंटर की नहीं, माननीय न्यायाधीश की है। दूसरा जब आप नवजोत सिंह सिद्धू का साइट करते हैं अंडरलाइन करके, तो ये सेंटेंस जो आपने अंडरलाइन किया है, ये क्या कहता है, But the person seeking stay of conviction should specifically draw the attention of the appellate court to the consequences that may arise, if the conviction is not stayed.

श्री राहुल गांधी जी ने क्या किया था – यही तो बताया था कि परिणाम कितने सीरियस हैं कि मुझे जो मानवाधिकार है पार्लियामेंट के अंदर बोलने का या रहने का वो निलंबित हो जाएगा और याद रहे कि यही कॉन्सिक्वेंसेस मर्डर चार्ज में 2007 में माननीय सिद्धू साहब ने उच्चतम न्यायालय को बताया और उन्होंने सस्पेंड कर दिया कनविक्शन मर्डर चार्ज में। इसको साइट करते हैं माननीय न्यायाधीश, अंडरलाइन करते हैं, लेकिन मेरे विरुद्ध लागू करते हैं। ये आपको पारदर्शी लिखित रूप से आम आदमी को समझने वाली गलतियां बता रहा हूं, मैं कोई कानूनी दलील नहीं कर रहा हूं।

तीसरा केस साइट किया है रविकांत पाटिल का, अंडरलाइन किया है। वही कहा है Should draw the attention of the appellate court to the consequences that may arise, if the conviction is not stayed. ये इसलिए लिखा जाता है सेंटेंस कि जहाँ पर कोई आदमी निलंबित हो जाए, सस्पेंड हो जाए असेंबली से या पार्लियामेंट से तो ये परिणाम आप लाइए सामने, हम सस्पेंड कर देंगे कनविक्शन। इसको साइट किया गया है मेरे विरुद्ध। ये तो मजाकिया गलती हो गई और इसको हम उच्च न्यायालय में बिल्कुल सामने रखेंगे।

एक चौथा केस श्याम नारायण पांडेय साइट किया गया है, आपके पन्ने 6 में होना चाहिए, अगर आपके पास कॉपी है तो। उसमें लिखा है – If the convict is involved in crime which are so outrageous, then it would have serious impact on the public perception, of the integrity of the institution, that it should not be stayed. क्रिमिनल मानहानि सो आउटरेजियस, इसमें तो टेरिरिज्म जैसी बात कर रहे हैं या खून खराबे की बात कर रहे हैं। मानहानि का चार्ज है, जो अभी मानहानि के लेवल पर है। इस प्रकार के कई ऐसे और उदाहरण हैं, जो दिखाता है कि प्राथमिक सिर्फ देखने से भी निर्णय संदिग्ध है, गलत है कानूनी रूप से, जिसका आधार नहीं है।

तीन और जगह एक उसका उदाहरण है, पृष्ठ नंबर 10 पर और एक अंत में वापस – बार-बार इस न्यायालय ने इनके माननीय न्यायाधीश ने कहा है कि the appellant had insulted and humiliated Mr. Modi, the Prime Minister and then he said- and other thirteen crore members of the Modi community. तीनों जगह ये बड़ा स्पष्ट है, मैं कोट कर रहा हूं, मैं अपनी बात नहीं कह रहा हूं।

ये बड़ा स्पष्ट है कि उनका पूरा निर्णय इस बात से एक ओवर शेडो हो गया है या ज्यादा प्रभावित हो गया है या दुष्प्रभावित हो गया है कि माननीय मोदी जी डिफेम हुए हैं, लेकिन वो बात भूल गए जनाब कि मोदी जी तो कंप्लेंनेंट ही नहीं हैं। हाँ, अगर आप कहते हैं कि हर उनमें से जो 13 करोड़ मोदी हैं, जो इन्होंने लिखा है, उनमें से कोई भी आकर ये याचिका डाल सकता है, तो बात दूसरी है, लेकिन उन्होंने हमेशा कहा है। ये भी पढ़िए दूसरी जगह, जहाँ कहा है उन्होंने पैरा 5, at page 12-

Derogatory remarks against the Hon’ble Prime Minister Shri Narendra Modi in general public and further, compared the person having Modi surname. So, clearly, unfortunately, he is influenced by the high office of the Hon’ble Prime Minister, forgetting that the Hon’ble Prime Minister is not the complainant. As a matter of fact, one of the important point is- in defamation law is that only the person directly affected can maintain. It’s a mute question of arguments that the other members of Modi community, can and cannot or to what extent can maintain? वो हम आर्ग्यू करेंगे, लेकिन मैं आपको इसका एक स्ट्रक्चर बता रहा हूं इस निर्णय का। पहले दसों निर्णय साइट करना, उनके गलत पोर्शन पर रिलाय करना, ये सजेस्ट करना कि हमने कॉन्सिक्वेंस आर्ग्यू नहीं किए। ये नहीं देखना कि वो सब उदाहरण ऐसे केस के हैं, जो इससे बहुत ज्यादा सीरियस थे और हमारे डिफेमेशन केस में अप्लाई करना।

जो 202 ज्यूरिस्डिक्शन की बात आपको याद है, जो मैंने पहले की थी कि अगर कोलार में ये चीज हुई थी और गुजरात पहुंच जाए कोई आदमी याचिका लेकर, तो 202 प्रावधान में पहले आपको प्राथमिक रूप से थ्रेशोल्ड में शुरुआत में ये देखना पड़ता है कि क्या वहाँ पर अधिकार क्षेत्र या ज्यूरिस्डिक्शन है कि नहीं। उस पर एक पूरा सेक्शन लिखा है लेकिन ये नहीं कहा कि भाई, मजिस्ट्रेट का ऑर्डर जिसको हमने चुनौती दी है सेशन कोर्ट में, उन्होंने कहाँ डील किया है इसके साथ या उनका इसके साथ डील करना सही है या गलत है? ये कहीं नहीं बता पाएं हैं ये। ये पूरा तीन-चार पन्नों पर उन्होंने डील किया है यानी सेशन कोर्ट ने, माननीय न्यायाधीश ने। लेकिन ये नहीं बता पाए कि किस प्रकार से ये जस्टिफाई होता है कि कोलार से जो गुजरात की यात्रा है, उसको उन्होंने 202 को अप्लाइ करे, लागू किए बिना कैसे निर्णित किया।

अंत में मैं जो पेरा 12 है, उसके अंत का पोर्शन पढ़ देता हूं, अपनी बात खत्म करता हूं हिंदी में – 

Based on the above discussion, I hold that the learned counsel for the appellant has failed in demonstrating, by not staying the conviction and denying an opportunity to contest the election or account of disqualification and irreversible and irrevocable damages, he cited to be caused. आप ये बताएं मुझे, मैं जानना चाहूंगा, मैं एजुकेट होना चाहूंगा कि किसी भी एमपी, एमएलए, इससे ज्यादा क्या बता सकता है कि मेरे जो दिन निकल गए पार्लियामेंट के, संसद के उनको आप वापस नहीं दे सकते। इरिवर्सिबल का मतलब क्या होता है और क्या दिखा सकता है कोई? कोई दुनिया में ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो इन्होंने लिखा है यहाँ पर, By not staying conviction and denying an opportunity, irrevocable and irreversible damages, he cited to be caused, that is the whole case of Shri Rahul Gandhi for stay of conviction.  

बाद में आप कनविक्ट करिए ना, फाइनल में हियरिंग में कनविक्ट करिए, लेकिन जब तक ये लंबित है, तब तक स्टे करें। इससे ज्य़ादा क्या प्रभावशाली कारण हो सकता है, जिसको 3 संटेस, 6 लाइन में 12 नंबर पैरा में डिसमिस कर दिया है। ये सब इसके अलावा बहुत सारी और गलतियां हैं, जिनको चुनौती बहुत जल्द से जल्द दी जाएगी। 

एक प्रश्‍न पर कि आपने कहा कि मजिस्‍ट्रेट इंफ्लुएंस्ड लगते हैं, तो क्या उन पर राजनैतिक दबाव था? डॉ० अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि देखिए, मेरे वकील होने का फायदा ये है कि मैं अपने हर शब्‍द को बहुत प्रिसाइजली चूज करता हूं मैंने कहा कि 3 पैराग्राफ में उन्‍होंने लिखा है कि The person defamed is Hon’ble Prime Minister Mr. Narendra Modi. Therefore, there is a legal error by his judgment being influenced or affected by a resumption that the complainant is a Prime Minister. If I keep writing that you are defamed. You must also add, but, anyway I am ignoring it, because you are not a complainant that’s the legal error. These are grounds, which will be taken upfront in the ground of appeal. Whatever, I have discussed with you, are part of grounds of appeal. There is no political thing in this. The second part of my briefing is not the political part at all.

एक अन्‍य प्रश्‍न पर कि जिस कानून के तहत इनकी सदस्‍यता गई है, आपको लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को टाइमलाईन इस पूरे मामले में फिक्‍स  करना चाहिए कि कैसे कार्रवाई हो? डॉ० सिंघवी ने कहा कि निश्‍चित रूप से नहीं करने का तो सवाल नहीं उठता, मैं खुद उसमें वकील था, उसके एक हिस्‍से में लक्षद्वीप वाले केस में मैं ही वकील हूं उच्चतम न्‍यायालय में। जिस दिन मैं आया उच्चतम न्‍यायालय में और हमारी टर्न आने वाली थी, मैं मतलब बहस अभी शुरू करने वाला था, उसके 3 मिनट पहले आकर उन्‍होंने एक चिट्ठी दी कि साहब अब हम ले रहे हैं वापस इसको, उसके महीने भर पहले तक वो बेचारा दस्‍तक डाल रहा था दरवाजे पर घुसने के लिए, उन्‍होंने उसको संसद में आने नहीं दिया था।

देखिए हर चीज संविधान में बाबा साहेब ने, आपके सभी संविधानिक पूर्वजों ने लिखना उपयुक्‍त नहीं समझा कि आप कब बाथरूम जा सकते हैं, कब दरवाजा खोल सकते हैं, क्‍या कर सकते हैं ये थोड़ी लिखा जाता है संविधान में, ये माना जाता है कि सुशासन के जो सिद्धांत हैं उनको फॉलो किया जाएगा, हर चीज राजनीतिक नहीं होगी तो अगर आप हर चीज में ये कहेंगे मैं कोर्ट जाकर आपको मिल ही जाएगा ऑर्डर, आप ले आईए ऑर्डर, तब हम करेंगे, तो गलत तरीका है न ये।

श्री राहुल गांधी को लेकर पूछे एक अन्‍य प्रश्‍न के उत्तर में डॉ० सिंघवी ने कहा कि पहली बात तो आपका जो प्रश्‍न है उसमें ही उत्तर निहित है। अगर मैं एक अखिल भारतीय स्‍तर का राजनीतिज्ञ हूं तो आप मुझे 2 वर्ष का दंड देंगे मेरे पद के अनुसार या इसके अनुसार कि जो मैंने कहा है वो बहुत ही एक घिनौना मान‍हानि है या मार्जिनल मान‍हानि है जो डिबेट हो सकती है या मान‍हानि नहीं है। आप इसलिए देंगे कि ये इतना बड़ा आप ओहदा उसको ऑक्‍युपाय करते हैं। ये तो सीधा ही गलत है कि नहीं है।

नंबर 2 मैं जानना चाहूंगा कि कितने केस हम जानते हैं वकील की ऐसे-ऐसे आम आदमी जबकि 2 वर्ष का, 1 वर्ष, 11 महीने, 29 दिन का दण्‍ड दिया गया हो, जो मैक्सिमम पनिशमेंट है, फर्स्‍ट टाइम अफेंडर के लिए, मेरे को तो कोई केस पता नहीं है, क्रिमिनल ट्रायल और लोग ज्‍यादा करते हैं मुझसे, उनको भी वो केस पता नहीं हैं।

नंबर 3, अगर आपको लगता है कि इसमें, कानून में एक प्रावधान है स्‍पष्‍ट रूप से लिखा हुआ कि कंप्‍लेंट इसकी वही कर सकता है जो पीड़ि‍त हो। तो ये तो क्‍लीयर है इस प्रावधान से कि इसका इरादा क्‍या है, इसका उद्देश्‍य और मंतव्‍य क्‍या है? कि मैं आपको गाली दूं तो आप मेरी तरफ खड़े हैं ये तो क्‍लीयर है, ये भी क्‍लीयर है कि जो 3 नाम लिए उस वाक्‍य में, उन तीनों में से किसी ने कंप्‍लेंट नहीं की। अब अगर उसके निहित एक ऐसी चीज है जो कि सिर्फ मैं कहता हूं एक महिला हैं, जिन्‍होंने साड़ी पहनी हुई  है, जिनकी हाईट 5 फीट 9 इंच हो, वो ऐसा बोलती हैं कि नाम नहीं लेता हूं। तब मालूम पड़ता है कि साहब एक ही व्‍यक्ति हो सकता है, शायद वो भी कर सकती हैं मेरे विरुद्ध मा‍नहानि, लेकिन ये कहना कि 13 करोड़, जिनका भी सरनेम, उपनाम मोदी है वो सभी दण्डित कर सकते हैं मुझको जबकि जो मोदी जिसकी बात कर रहा हूं मैं, वो खुद याचक नहीं हैं ये क्‍या कानून का उपयोग है, दुरूपयोग है, क्‍या है? विकृतपना है ये तो आप सब समझ सकते हैं।

एक अन्‍य प्रश्‍न पर कि क्‍या आपको लगता है कि हाई कोर्ट से रिलीफ मिलेगा? डॉ० सिंघवी ने कहा कि हाँ तो पहली बात तो जो दूसरा प्रश्‍न है उसका मतलब है कि कभी भी गांधी के विरुद्ध कोई भी मानहानि का करें तो उच्‍चतम न्‍यायालय तक आपको वो डिस्‍मिस करना चाहिए, उच्‍चतम न्‍यायालय अगर उनके पक्ष में होल्‍ड करती है तो वो जनता जर्नादन के विरुद्ध है, वो सिर्फ गांधी के घमण्‍ड के लिए ये निर्णय दे रही है, ये एक इसका यही निकाल सकता हूं मैं निष्कर्ष। अगर आपको ये सही लगता है किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी को कहना ये शोभा देता है, ये किस अक्‍ल से कहा गया है, कितना मजाकिया है ये साफ दर्शा रहे हैं आप।

जहां तक पहला प्रश्‍न था आपका – देखिए मैं इन मामलों में भविष्‍यवाणी कभी नहीं करता हूं। हम सभी न्‍यायपालिकाओं का बहुत आदर करते हैं, हमें उस पर विश्‍वास है, हमारे पास दो पक्ष खुले हैं – उच्‍च न्‍यायालय है, उसके ऊपर उच्‍चतम न्‍यायालय है। मैंने आपको 5 ही बताए हैं अभी हमारे ग्राउण्‍ड लोबी पर 10 और कारण होंगे। ये बहुत वजनदार हैं, महत्‍वपूर्ण हैं तो बहुत हम इसके बारे में ऑप्टिमिस्टिक हैं, आशावान हैं, लेकिन भविष्‍यवाणी, इसका मतलब नहीं होता कि भविष्‍यवाणी करने लगूं आपके सामने जैसे कि बीजेपी करती है जो आपके दूसरे प्रश्‍न में बीजेपी ने की वैसी भविष्‍यवाणी नहीं करता हूं मैं।  

एक अन्‍य प्रश्‍न पर कि हाई कोर्ट कब तक जाएंगे क्‍या कोई टाइमलाइन है? डॉ० सिंघवी ने कहा कि  बहुत निकट भविष्‍य में, आज तो निर्णय आया है। ये टाइम लाइन से मुझे रोचक लगता है, पिछली बार हमें बहुत सारे इंटरनेट लॉयर, व्‍हाट्सएप लॉयर सुझाव दे रहे थे कि मैं तो 8 घंटे में अपील फाईल कर देता हूं और मैं तो 12 घंटे मैं अपील फाईल कर देता हूं तो इसलिए उस तरह की चीज का कोई फायदा नहीं है।

एक अन्‍य प्रश्‍न के उत्तर में डॉ० सिंघवी ने कहा कि आप जो कर रहे हैं मिक्‍सड अप कर रहे हैं। वो किसी एविडेंस एक्‍ट में ईमेल कम्‍यूनिकेशन को वेरिफाई करना होता है बाय फोरेंसिक सिस्‍टम उसके ऊपर था, इससे कोई मतलब नहीं है, उसका। 

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