इस बार अच्छी बारिश होने से दालें सस्ती हो सकती हैं। ये दावा हम नहीं बल्कि इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन का बड़ा दावा है। दरअसल शुक्रवार को दिल्ली के विज्ञान भवन में इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन द्वारा भारत दलहन सैमीनार 2024 का आयोजन किया गया। भारत के दलहन और अनाज उद्योग और व्यापार के शीर्ष निकाय और साथ ही वैश्विक दलहन क्षेत्र के ज्ञान केंद्र, भारत दलहन और अनाज संघ (आईपीजीए) ने द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में स्वदेशी दलहन उत्पादन और नीति सुधारों पर केंद्रित भारत दलहन सेमिनार के पहले संस्करण की मेजबानी करी गई।
यह सेमिनार भारतीय दलहन और अनाज क्षेत्र को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने और भारत की खाद्य और पोषण सुरक्षा को आगे बढ़ाने के आईपीजीए के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में एक कदम है। जिसमें भारत सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के राज्य मंत्री बी एल वर्मा, निमुबेन जयंतीभाई बंभानिया, संसद मंत्री भावनगर लोकसभा, राज्य मंत्री, उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री, मितेश पटेल, संसद सदस्य, आनंद, डॉ. अशोक गुलाटी, प्रतिष्ठित प्रोफेसर, आईसीआरआईईआर, पूर्व अध्यक्ष सीएसीपी, विजय पॉल शर्मा, अध्यक्ष, सीएसीपी , विजय अयंगर, अध्यक्ष, ग्लोबल पल्स कन्फेडरेशन, बिमल कोठारी, अध्यक्ष, आईपीजीए; और मानेक गुप्ता – उपाध्यक्ष आईपीजीए शामिल थे। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और ब्राजील सहित कई देशों के प्रतिनिधि भी थे। इस सेमिनार में क्षेत्रीय संघों, मिल मालिकों, प्रचार एजेंसियों, अनुसंधान वैज्ञानिकों, खाद्य प्रौद्योगिकीविदों, प्रसंस्करण कंपनियों, मूल्य श्रृंखला प्रतिभागियों, सेवा प्रदाताओं और अन्य संबंधित व्यक्तियों सहित 700 से अधिक प्रतिनिधियों ने भारतीय दालों के अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा करी। उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के राज्य मंत्री बी एल वर्मा ने कहा, ” पिछले पांच वर्षों में अनाज उत्पादन 21.1 मिलियन टन से बढ़कर 22.7 मिलियन टन हो गया है, जबकि खपत 22.7 मिलियन टन से बढ़कर 24.6 मिलियन टन हो गई है। इस मांग और आपूर्ति को संतुलित करने का अवसर अभी भी बना हुआ है। हालांकि, पानी की कमी के कारण चावल की व्यापक खेती टिकाऊ नहीं है। दलहन उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने से भारत को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिल सकती है। किसानों को दालों के लिए उचित मूल्य मिल रहे हैं और सरकार ने उन्हें और अधिक सहायता देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) निर्धारित किए हैं। कृषि मंत्रालय के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, 2015-16 में दालों का उत्पादन 16.3 मिलियन टन था। यह 2023-24 में बढ़कर 24.5 मिलियन टन हो गया है। पिछले पांच वर्षों में, औसत उत्पादन 24 से 25 मिलियन टन के बीच रहा है, फिर भी मांग लगभग 30 , 32 मिलियन टन होने का अनुमान है। 2024 दालों के उत्पादन के लिए एक असाधारण वर्ष रहा है, विशेष रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में अनुकूल दक्षिण-पश्चिम मानसून के कारण। यदि अगस्त और सितंबर में मध्यम बारिश जारी रहती है, तो हम पिछले साल के उत्पादन को पार करने के बारे में आशावादी हैं, जो भारी वर्षा से प्रभावित था। हमें मांग को पूरा करने और खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने के लिए दालों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक दृष्टि और नीतिगत उपायों की आवश्यकता है।” ग्लोबल पल्सेस कन्फेडरेशन के अध्यक्ष विजय अयंगर ने कहा, “भारत, दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक, उपभोक्ता और आयातक देश है, जो वैश्विक दाल व्यापार और उद्योग को आगे बढ़ाने और विस्तार देने में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हम ऐसे महत्वपूर्ण मंचों के माध्यम से वैश्विक दाल क्षेत्र के प्रमुख हितधारकों के बीच ज्ञान प्रदान करने, सूचना प्रसारित करने, संवाद को प्रोत्साहित करने और पारदर्शिता को बढ़ावा देने में आईपीजीए की भूमिका की सराहना करते हैं। पेश है हमारे वरिष्ठ संवाददाता राजेश खन्ना की विशेष रिपोर्ट
यह सेमिनार भारत में दालों के उत्पादन के भविष्य पर चर्चा करने तथा रणनीति बनाने के लिए एक व्यापक मंच के रूप में कार्य करता है, जिसमें स्वदेशी उत्पादन को बढ़ाने तथा मांग-आपूर्ति के अंतर को पाटने पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण आकर्षण आईपीजीए द्वारा “पल्स मिलर्स के लिए पुस्तिका” का विमोचन भी किया था, जो दाल मिलों के लिए भारत की नियामक आवश्यकताओं तथा दाल प्रसंस्करण में गुणवत्ता मानकों पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। इस पुस्तिका का उद्देश्य दालों के मूल्य श्रृंखला की दक्षता तथा लचीलापन बढ़ाना, उद्योग की चुनौतियों का समाधान करना तथा व्यवसाय के भीतर विश्वास को बढ़ावा देना है। टोटल ख़बरें दिल्ली से राजेश खन्ना की रिपोर्ट।


