डीयू के हिन्दू अध्ययन केंद्र द्वारा “मानवता के लिए श्री रामचरितमानस” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

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*जो धारण करने योग्य है वही धर्म है: गजेंद्र सिंह शेखावत

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू अध्ययन केंद्र एवं संस्कृति संज्ञान के द्वारा “मानवता के लिए श्री रामचरितमानस” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। डीयू के कांफ्रेंस सेंटर में आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान लगभग 300 श्रोतागण उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि “धार्यति इति धर्मः” अर्थात जो धारण करने योग्य है वही धर्म है।

उन्होंने बताया कि धर्म की प्रासंगिकता हमारे प्राचीन ग्रंथों से ही है। उन ग्रंथों में से जो ग्रंथ सरल भाषा में सामान्य जन मानस तक पहुंचा वह तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस ही है। इसी कारणवश धर्म और रामचरितमानस दोनो आज भी एक दूसरे के सापेक्ष हैं। उन्होंने बताया की आज की हमारी सारी समस्याओं का समाधान, श्री रामचरितमानस में ही समाहित है। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन आज के समय में हो रहे मानसिक क्षरण का अंत करने हेतु शुद्धिकरण के यज्ञ के समान है। उन्होंने आधुनिक परिवेश में होने वाले शोध के क्षेत्र में अप्लाइड रामचरितमानस की स्थापन हेतु पक्ष प्रस्तुत किए। उन्होंने अपने वक्तव्य का अंत श्री रामचरितमानस में निहित विश्व बंधुत्व और सर्व जन कल्याण के भाव को स्थापित करते हुए किया।

इस कार्यक्रम के प्रथम चरण में डॉ. प्रदीप कुमार सिंघल, (राष्ट्रीय अध्यक्ष, संस्कृति संज्ञान) के नेतृत्व में संस्कृति संज्ञान के द्वारा संरचित पुस्तक “मानस के मोती” पुस्तक का विमोचन भी किया गया। राष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए डीन ऑफ कॉलेजज प्रो. बलराम पाणि ने अपने व्याख्यान में श्री रामचरितमानस की  प्रत्येक युग एवं काल में चिरकालिक सार्थकता को सिद्ध किया। उन्होंने श्री रामचरितमानस में वर्णित विभिन्न पक्षों का वर्णन करते हुए सफलता, आत्मविश्वास, कूटनीति, प्रबंधन एवं सही गलत की परिभाषा के महत्व को साझा करते हुए अपने वक्तव्य को पूर्ण किया।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि डॉ. संतोष तनेजा, (संस्थापक एवं सलाहकार, संस्कृति संज्ञान), ने अध्यात्म के क्षेत्र की व्यापकता को विभिन्न युगों में समाहित करके सभी श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया की “धर्म युद्ध” केवल त्रेता में ही नही हुआ अपितु द्वापर में भी कौरवों और पांडवों के मध्य भी हुआ, जिसमे भगवान श्री कृष्ण ने कर्म और कर्तव्य को ही सर्वोपरि बताया है। विशिष्ट अतिथि अनिल गुप्ता (प्रांत कार्यवाह, दिल्ली प्रांत संस्थापक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने अपने भाषण से सभी भागीदारों  को उद्भोधित करते हुए मन की सार्थकता को “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी” के माध्यम से स्पष्ट किया। डॉ प्रेरणा मल्होत्रा, (कार्यक्रम संयोजिका, सह- निदेशिका, हिंदू अध्ययन केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालयलय) ने अतिथियों के उद्बोधन के पश्चात सभी का धन्यवाद ज्ञापन देते हुए हिंदू अध्ययन केंद्र की गरिमा का व्याख्यान किया और दिल्ली विश्वविद्यालय में इस केंद्र की महत्ता को वर्णित किया।

पूर्ण सत्र का आरंभ करते हुए प्रो. नरेश कक्कड़, (पूर्व डूटा अध्यक्ष, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने राम की प्रासंगिकता पर चर्चा की और यह बताया कि कैसे सुंदर काण्ड हनुमान जी पर आधारित होने के कारण माता अंजना द्वारा दिए गए नाम सुंदर पर आधारित है। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू अध्ययन केंद्र एवं संस्कृति संज्ञान  द्वारा आयोजित, “मानवता के लिए श्री रामचरितमानस”  राष्ट्रीय सम्मेलन में विद्वानों के द्वारा श्री रामचरितमानस पर विचार विनिमय के माध्यम से बौद्धिक चर्चा के लिए एक मंच के रूप में कार्य किया।

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