अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर डीयू एसओएल में चर्चा आयोजित

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*मुख्य रूप से महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई है पश्चिमी नारीवाद: प्रो. पायल मागो

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र, कॉलेज ऑफ ओपन लर्निंग, एसएचओडीएच और डायलॉग्स फॉर विकसित भारत के सहयोग से, “विकसित भारत 2047 को आकार देने में महिला नेतृत्व” विषय पर के चर्चा का आयोजन किया गया। स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के सेमिनार हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय के जूलॉजी विभाग की प्रमुख प्रोफेसर रीना चक्रवर्ती को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। गौरतलब है कि प्रोफेसर रीना चक्रवर्ती को सतत मीठे पानी की जलीय कृषि में उल्लेखनीय योगदान हेतु अनुसंधान (जैविक विज्ञान) श्रेणी में 8वें विजिटर पुरस्कार से हाल ही में राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया है।

इस अवसर पर डीयू के कैंपस ऑफ ओपन लर्निंग और महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र की निदेशक प्रो. पायल मागो ने अपने संबोधन में कहा कि जब हम पश्चिमी नारीवाद (Western Feminism) की बात करते हैं, तो यह मुख्य रूप से महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई रही है। वहाँ महिलाओं को मतदान का अधिकार, संपत्ति रखने का अधिकार, और शिक्षा पाने का अधिकार तक नहीं मिला था। अगर वे नौकरी करती थीं, तो समान कार्य के लिए पुरुषों को अधिक वेतन दिया जाता था जबकि महिलाओं को कम मिलता था। महिलाओं के नाम पर संपत्ति और धन का हस्तांतरण नहीं होता था।  लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह स्थितियाँ कभी नहीं रहीं। भारत में प्राचीन काल से ही महिलाओं को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।

प्रो. पायल मागो ने बताया कि जब वह विदेश गई थी, तो उनसे पूछा गया कि भारत में महिलाओं को शिक्षा और प्रवेश का अधिकार कब मिला? उनका उत्तर यही था कि भारत में नारी शिक्षा का अधिकार छिना नहीं गया था, बल्कि विदेशी आक्रमणों और सामाजिक बंधनों के कारण यह सीमित हुआ।  उन्होंने कहा कि हमारे यहां महिला संघर्ष का इतिहास में दस्तावेजीकरण नहीं हुआ, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संघर्ष नहीं हुआ। बार-बार हुए आक्रमणों के कारण महिलाओं को पर्दे में रखा गया, लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी शक्ति और नेतृत्व का परिचय दिया। माता अहिल्याबाई होल्कर, जीजाबाई, रानी लक्ष्मीबाई—ये सब उदाहरण हैं कि भारतीय महिलाओं ने हमेशा अपनी शक्ति, ज्ञान और नेतृत्व से समाज को दिशा दी। पश्चिम में महिलाओं को जिन अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ा, वह लड़ाई भारतीय महिलाओं को नहीं लड़नी पड़ी, क्योंकि भारतीय समाज ने हमेशा महिलाओं को परिवार और समाज का आधार माना है। लेकिन हमें क्या सीखने की ज़रूरत है? 

प्रो. पायल मागो ने कहा कि आज जब हम नारी सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो यह ज़रूरी है कि हम अपनी पारिवारिक और सांस्कृतिक जड़ों को न भूलें। एक माँ अपने बच्चे का पालन-पोषण सिर्फ एक परिवार के सदस्य के रूप में नहीं करती, बल्कि वह एक सभ्य, शिक्षित और सशक्त नागरिक तैयार करती है। इस चर्चा में सुश्री रामी निरंजन देसाई (लेखिका और स्तंभकार), प्रो. अमिता गुप्ता (अध्यक्ष, जैव रसायन विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. पायल मागो (निदेशक, कैंपस ऑफ ओपन लर्निंग और महिला अध्ययन और विकास केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय) और प्रो. सुमन शर्मा (संयुक्त निदेशक, महिला अध्ययन और विकास केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय) सहित अनेकों गणमान्य महिलाओं ने भाग लिया। 

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