पुस्तक “वी एंड द वर्ल्ड अराउंड” पर चर्चा के दौरान बोले डीयू कुलपति

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*आजादी के बाद भारत में कम हुए देश की चिंता करने वाले: प्रो. योगेश सिंह

*भारत ने नहीं किया लोगों को गुलाम बनाकर व्यापार: डॉ मनमोहन वैद्य

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि आजादी के बाद भारत में अपनी चिंता करने वाले बढ़े हैं जबकि देश की चिंता करने वाले कम हुए हैं। प्रो. योगेश सिंह “वी एंड द वर्ल्ड अराउंड” पुस्तक पर चर्चा के के लिए आयोजित एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बोल रहे थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के कान्वेंशन हाल में आयोजित इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए पुस्तक के लेखक एवं आरएसएस के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ मनमोहन वैद्य ने कहा कि ईस्वी सन 01 से लेकर 1500 तक विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 30% से अधिक था जोकि दुनिया में सर्वाधिक था। हम दुनिया में व्यापार करने गए, उपनिवेश नहीं बनाए। भारत ने लोगों को गुलाम बनाकर व्यापार नहीं किया।

डॉ मनमोहन वैद्य ने कहा कि 1945 में दूसरा विश्व युद्ध समाप्त होने के पश्चात इंग्लैंड, जर्मनी और जापान जैसे देशों की ढांचागत क्षति बहुत हुई थी। उन्होंने फिर से देश खड़े करने में शुरुआत की। 1948 में इज़राइल ने 1800 वर्षों के पश्चात नया आरंभ किया। 1947 में भारत स्वाधीन हुआ। भारत की ढांचागत क्षति इंग्लैंड, जर्मनी और जापान जैसी नहीं हुई थी। लेकिन अब तक के वर्षों में इज़राइल, जर्मनी, जापान, इंग्लैंड जैसे देशों ने जितनी प्रगति की है भारत में उतनी नहीं हुई। इसका कारण है कि हमारे पास डायरेक्शन की कमी थी। इन चारों देशों में एकरूपता यह है कि हम कौन हैं, हमारा इतिहास क्या था और हमारे पुरखे कौन थे। इस बारे में सब लोग एकमत हैं। भारत में “हम कौन हैं” के बारे में हमारा सबका एक मत नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत अलग-अलग संस्कृतियों का देश नहीं है, भारत की संस्कृति एक है जिसका आधार अध्यात्म है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि अच्छी किताबों पर चर्चा लोगों की समझ और ज्ञान को विकसित करती है। उन्होंने उक्त पुस्तक के संदर्भ में चर्चा करते हुए कहा कि ‘आई’ से ‘वी’ तक की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है। “वी एंड द वर्ल्ड अराउंड” पुस्तक में इस पर चर्चा की गई है। प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि जैसा हमारा मन होगा वैसी हमारी दृष्टि होगी। इसलिए मन को बनाने का काम बहुत जरूरी है। कार्यक्रम के आरंभ में दक्षिणी परिसर के निदेशक प्रो. श्री प्रकाश सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया और कार्यक्रम के अंत में डीन अकादमिक प्रो. के. रत्नाबली ने आभार ज्ञापित किया। इस दौरान पुस्तक पर खुली चर्चा भी हुई। उपस्थित शिक्षाविदों ने खुली चर्चा में लेखक से प्रश्नों के माध्यम से अपनी जिज्ञासाओं पर प्रतिक्रिया प्राप्त की।   

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