भाषा विवाद के बीच मराठी संत की फिल्म नफरत, विवाद नहीं प्रेम का पाठ पढ़ाती है

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छत्रपति शिवाजी महाराज के समकालीन महान संत और कवि तुकाराम के जीवन पर आधारित यह फिल्म आपकी 16 वी शताब्दी में लेकर जाती है, लंबी रिसर्च और धार्मिक विद्वानों से लंबी चर्चा के बाद बनीं यह फिल्म उस महान कवि और समाज सुधारक संत तुकाराम की जीवनी और उनके कार्यों को पूरी ईमानदारी के साथ पेश करती है, फिल्म की पूरी यूनिट फिल्म के कलाकारों ने महाराष्ट्र के छोटे से गांव में लंबा वक्त इस लिए गुजारा की फिल्म उस दौर और माहौल को जीवंत कर सके, निर्देशक आदित्य ओम और फिल्म के लीड और सहयोगी कलाकारों की मेहनत साफ दिखाई देती है, यह इत्तफाक ही है कि फिल्म की रिलीज ऐसे वक्त हुई जब महाराष्ट्र और साउथ के कुछ राज्यों में सत्ता की राजनीति करने वाले हिंदी विरोध करके अपनी राजनीति चमकाने में लगे है उन्हें इस फिल्म के मेकर से सीखना चाहिए़ कि उन्होंने इस महान मराठी संत की फिल्म को हिंदी में बनाया।
निर्देशक आदित्य ओम ने कहा महान संत पर फिल्म बनाना मेरे लिए गर्व का विषय है मैं चाहता हु आज की युवा पीढ़ी को हमारे इन महान संत समुदाय का ज्ञान होना चाहिए आगे भी संत कबीर, संत तुलसी दास और कबीर पर फिल्में बनाई जाए ।
स्टोरी प्लॉट
महाराष्ट्र के कोल्हापुर से कुछ दूर एक गांव में स्टार्ट टू लास्ट यहां के ग्रामीण समुदाय के साथ शूट हुई यह फिल्म तुकाराम के भक्ति आंदोलन और उनकी सामाजिक क्रांतिकारी का पूरी ईमानदारी के साथ पेश करती है , अपने छोटे बच्चों और पत्नी का मोह छोड़ कर अपने विट्ठल की भक्ति में तल्लीन हो चुके तुकाराम को घर में अपनी पत्नी के ताने और गांव में रूढ़ीवादी पंडित समुदाय के विरोध का सामना करना होता है लेकिन वह अपनी रचनाओं, अभंगों के माध्यम से समाज में व्याप्त छुआछूत, जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास और रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाने में लगे रहते है।
अभिनय , निर्देशन
मराठी सुपर स्टार सुबोध भावे का अभिनय इस फिल्म की यूएसपी है, अपने बेहतरीन अभिनय से उन्होंने तुकाराम के किरदार को पर्दे पर जीवंत किया है। भगवान विट्ठल की भूमिका में अरुण गोविल छा गए, छोटी सी भूमिका के बावजूद संजय मिश्रा प्रभावशाली रहे, तुकाराम की पत्नी के किरदार में शीना चौहान का जवाब नहीं, फिल्म के सहयोगी कलाकारों ने अपनी अपनी भूमिका को अच्छे ढंग से निभाया, निर्देशक आदित्य ओम ने स्क्रिप्ट के साथ न्याय किया है ।
ओवर ऑल
संत तुकाराम महाराज पर पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ युवा निर्देशक आदित्य की यह फिल्म उनकी ऐतिहासिक और सामाजिक भूमिका को गहराई से पेश करने के साथ साथ दिखाती है कि किस प्रकार यह महान संत महाराष्ट्र का यह संत अपने कीर्तन और भजनों के माध्यम से गांव-गांव में लोगों को जोड़ते और भक्ति के माध्यम से समाज में समानता का वातावरण निर्मित करने की मुहिम में लगे थे फिल्म को देख कर आपको लगेगा कि महाराज का व्यक्तित्व विद्रोही था, लेकिन ये विद्रोह प्रेम और करुणा से प्रेरित था। मराठी बायोपिक फिल्मों के किंग माने जाने वाले मराठी सुपर स्टार सुबोध भावे ने अपने सशक्त अभिनय से संत तुकाराम को स्क्रीन पर जीवंत कर दिखाया है, अगर आप साफ सुथरी और हमारी प्राचीन धार्मिक विरासत से जुड़ी फिल्मों को पसंद करते है और इस महान संत के बारे में विस्तार से जानना चाहते है तो अपने परिवार के साथ संत तुकाराम से मिलने अपने पास के सिनेमाघर जाए।
अवधि: 135 मिनट

रेटिंग: तीन स्टार

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