नई दिल्ली, 15 जुलाई 2026: दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने प्रशासनिक सुधार और जनहित में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में ‘दिल्ली राइट ऑफ सिटिजन टू टाइम बाउंड एंड ईज ऑफ डिलीवरी ऑफ सर्विस बिल, 2026’ (दिल्ली नागरिकों का समयबद्ध व सुगम सेवा प्रदाय का अधिकार विधेयक, 2026) को मंजूरी दे दी गई है। इस नए कानून के तहत अब दिल्ली सरकार के अधिकारियों के लिए नागरिकों को तय समय-सीमा के भीतर सरकारी सेवाएं देना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। लापरवाही बरतने या बिना किसी ठोस कारण के देरी करने वाले अधिकारियों की जेब ढीली होगी और उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
यह नया कानून वर्ष 2011 के पुराने अधिनियम का स्थान लेगा और इसमें अत्याधुनिक डिजिटल तकनीकों का समावेश किया गया है ताकि सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार और लेटलतीफी को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
ऑनलाइन होगी पूरी व्यवस्था; दफ्तरों के चक्करों से मुक्ति
विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, आवेदन से लेकर सेवा प्राप्त होने तक की पूरी प्रक्रिया को 100% डिजिटल (ऑनलाइन) बनाया जाएगा।
- नागरिक अपने घर बैठे ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे।
- प्रत्येक आवेदन को एक ‘यूनिक एप्लीकेशन नंबर’ दिया जाएगा।
- आवेदन किस स्तर पर लंबित है, इसकी रियल-टाइम ऑनलाइन ट्रैकिंग की जा सकेगी।
- इससे नागरिकों को काम कराने के लिए सरकारी दफ्तरों की चौखट पर बार-बार भटकना नहीं पड़ेगा।
‘ऑटोमैटिक एस्केलेशन’: देरी होते ही खुद दर्ज होगी अपील
इस विधेयक की सबसे बड़ी और अनूठी विशेषता इसकी ‘स्वतः अपील’ (Automatic Escalation) प्रणाली है। यदि कोई अधिकारी तय समय-सीमा में सेवा उपलब्ध कराने में विफल रहता है, तो आवेदक को किसी ऊपरी अधिकारी के पास शिकायत लेकर जाने की जरूरत नहीं होगी। वह मामला ऑटोमैटिक रूप से ‘नागरिक शिकायत निवारण प्राधिकारी’ के पास अपील के रूप में ट्रांसफर हो जाएगा। यदि वहां भी निर्धारित समय में फैसला नहीं होता, तो मामला खुद-ब-खुद ‘दिल्ली राइट टू सर्विस आयोग’ के पास चला जाएगा।
अफसरों पर लगेगा प्रतिदिन ₹250 जुर्माना
अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए इस कानून में सख्त दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है:
- विलंब शुल्क: बिना उचित कारण के सेवा प्रदान करने में देरी होने पर संबंधित नामित अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जाएगा, जिसकी अधिकतम सीमा ₹5,000 होगी।
- अनुचित अस्वीकृति: यदि कोई अधिकारी किसी नागरिक के आवेदन को बिना किसी ठोस आधार के खारिज करता है, तो उस पर ₹250 से ₹5,000 तक का एकमुश्त जुर्माना लगाया जा सकेगा।
- हालांकि, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत जुर्माना लगाने से पहले संबंधित अधिकारी को अपनी बात रखने और स्पष्टीकरण देने का पूरा अवसर दिया जाएगा।
‘दिल्ली राइट टू सर्विस आयोग’ का होगा गठन
प्रशासनिक व्यवस्था पर कड़ी निगरानी रखने और अपीलों के निपटारे के लिए दिल्ली सरकार एक स्वतंत्र और वैधानिक ‘दिल्ली राइट टू सर्विस आयोग’ का गठन करेगी। इस आयोग में एक अध्यक्ष और सदस्य होंगे। आयोग के पास सरकारी कार्यालयों का औचक निरीक्षण करने, दोषी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश करने, नए विभागों को इस कानून के दायरे में लाने और हर साल अपनी परफॉरमेंस रिपोर्ट जारी करने का अधिकार होगा। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक सरकारी विभाग में एक स्वतंत्र ‘शिकायत निवारण प्राधिकारी’ की नियुक्ति की जाएगी, जो 30 दिनों के भीतर अपीलों का निपटारा करेंगे।
पीएम मोदी के सुशासन के विजन को बढ़ा रहे आगे: मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता
इस ऐतिहासिक विधेयक पर बोलते हुए मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता ने कहा:
“माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में देश में जिस पारदर्शी, तकनीक-आधारित और नागरिक-केंद्रित शासन व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया है, हमारी सरकार भी उसी सुशासन के दृष्टिकोण को दिल्ली में आगे बढ़ा रही है। यह कानून दिल्ली के प्रशासनिक इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा। अब सरकारी सेवाएं पाना नागरिकों का कानूनी अधिकार होगा, और इसमें कोताही बरतने वाले अफसरों पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”












