कचरे से हरियाली की ओर एनडीएमसी का बड़ा कदम, एक साल में बनाई 10,000 किलो जैविक खाद

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नई दिल्ली, 25 अगस्त 2026 | कचरे को संपदा में बदलने की दिशा में नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) ने एक बड़ी पहल की है। एनडीएमसी ने पिछले एक साल में गीले और हरे कचरे से 10,000 किलोग्राम जैविक खाद का उत्पादन किया है। इस उपलब्धि के तहत सोमवार को पालिका केंद्र में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित कर कर्मचारियों और बागवानी विभाग को जैविक खाद बांटी गई।

कार्यक्रम में एनडीएमसी अध्यक्ष मनोज कुमार द्विवेदी ने पार्कों और बगीचों के लिए जैविक कम्पोस्ट से भरे तीन ट्रकों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस मौके पर श्री द्विवेदी ने कहा कि एनडीएमसी जल्द से जल्द अपने सभी पार्कों और बगीचों में 100 प्रतिशत जैविक खाद के इस्तेमाल का लक्ष्य हासिल करेगी।

उन्होंने कहा, “आज एनडीएमसी वर्मीकम्पोस्टिंग के जरिए गीले कचरे से बनी जैविक खाद बांटकर सस्टेनेबल वेस्ट मैनेजमेंट को बढ़ावा दे रही है। अब हम इस पहल को रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWAs) तक ले जाएंगे, ताकि निवासी अपने घरों के गमलों और नर्सरी में इस प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल कर सकें।” उन्होंने कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री के जीरो वेस्ट और धीरे-धीरे जीरो केमिकल इस्तेमाल के विजन के अनुरूप है।

श्री द्विवेदी ने बताया कि यह खाद चाणक्यपुरी के मधु लिमये मार्ग स्थित जैविक खाद सुविधा केंद्र में तैयार की गई है और पूरी तरह से एनडीएमसी क्षेत्र से निकलने वाले गीले कचरे और बागवानी कचरे से बनाई गई है। इससे कचरे को लैंडफिल तक ले जाने की जरूरत कम हुई है। उन्होंने कहा, “जिसे कभी कचरा माना जाता था, उसे अब कीमती संसाधन में बदला जा रहा है। हमारा मकसद सर्कुलर इकॉनमी की ओर बढ़ना है।”

एनडीएमसी ने जैविक कचरे की प्रोसेसिंग के लिए विकेंद्रीकृत मॉडल अपनाया है। परिषद के अधिकार क्षेत्र में कुल 79 कम्पोस्टिंग सेंटर बनाए गए हैं, जिनमें 46 कम्पोस्ट पिट, 27 ऑर्गेनिक वेस्ट कन्वर्टर, 5 कम्युनिटी कम्पोस्टर और ओखला में 60 टन क्षमता वाली वेस्ट-टू-कम्पोस्ट सुविधा शामिल है। इसके अलावा रिहायशी इलाकों में लगभग 110 एरोबिन लगाए गए हैं, जो रोजाना रसोई और बागवानी के कचरे को खाद में बदलते हैं। एनडीएमसी क्षेत्र में प्रतिदिन 80 से 100 टन हरा कचरा निकलता है, जिसे स्थानीय स्तर पर ही प्रोसेस किया जा रहा है।

श्री द्विवेदी ने नागरिकों से अपील की कि वे कचरे को स्रोत पर ही अलग-अलग करें – गीला, सूखा, सैनिटरी और खतरनाक कचरा – ताकि उसे खाद में बदला जा सके

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