फिल्म बिहार के एक काल्पनिक गांव देवनचल पर बेस्ड है। ऋषि (सिद्धार्थ) मुंबई में इंजीनियर है, अपनी पत्नी ममता (तमन्ना) के साथ। दोनों निःसंतान हैं और परिवार का दबाव झेल रहे हैं। पैतृक जमीन के बंटवारे के लिए दोनों छठ पूजा के दौरान अपने गांव आते हैं।
गांव में एक मान्यता है – गांव के पास एक घना जंगल है जिसकी रक्षा वन देवी करती हैं। सूरज ढलने के बाद जंगल में कोई नहीं जा सकता। ऋषि की जमीन उसी जंगल के अंदर है। यहीं से कहानी आस्था बनाम तर्क, लालच बनाम प्रकृति की बन जाती है। गांव का एक महत्वाकांक्षी आदमी (सुनील ग्रोवर) उस जंगल की जमीन हथियाना चाहता है।
फर्स्ट हाफ में फिल्म लोककथा, बिहार की मिट्टी, छठ पूजा की तैयारी और जंगल का रहस्य अच्छा बनाती है, लेकिन सेकंड हाफ में यही कहानी सुपरहीरो, हॉरर और मायथोलॉजी के बीच भटक जाती है।
फिल्म का आइडिया बहुत अच्छा था – बिल्कुल कांतारा जैसी फोक-हॉरर बनाने की कोशिश। अरुणाभ कुमार ने बिहार के फ्लेवर को पकड़ने की कोशिश की है, लेकिन स्क्रीनप्ले बहुत बिखरा हुआ है।
सिद्धार्थ मल्होत्रा एक्शन में ठीक हैं, लेकिन बिहारी बैकग्राउंड वाले किरदार में फिट नहीं बैठते। उनका स्क्रीन प्रेजेंस गांव की ऑथेंटिसिटी से अलग लगता है।
तमन्ना भाटिया को “कर्तव्यनिष्ठ पत्नी” वाले टाइपकास्ट रोल में बांध दिया गया है। वो खूबसूरत लगी हैं और ‘छठी मैया’ गाने में उनका अभिनय यादगार है, लेकिन उनके किरदार का आर्क अधूरा रह जाता है।
विलेन के तौर पर सुनील ग्रोवर की कॉमिक इमेज आड़े आती है। वो डराने की बजाय हंसाते ज्यादा हैं। मनीष पॉल शुरू में हंसाते हैं पर बाद में एक ही जोक रिपीट करते हैं।
कलाकार: सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, सुनील ग्रोवर, मनीष पॉल, अनुप सोनी, श्वेता तिवारी
निर्देशक: अरुणाभ कुमार
रेटिंग: 2 से 2.5 स्टार / 5







