नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता आज इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। म्यूज़ियम्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा ‘भगवान श्री बिरसा मुंडा, जनजातीय भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण एवं संग्रहालयों में उनका प्रतिनिधित्व’ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर के इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री गुप्ता ने कहा कि जनजातीय इतिहास भारत की कथा के उपेक्षित अध्याय नहीं, बल्कि हमारी सभ्यतागत यात्रा का अभिन्न हिस्सा हैं।
‘धरती आबा’ बिरसा मुंडा स्वाभिमान और सामाजिक जागरण के प्रतीक
अपने संबोधन में विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि ‘धरती आबा’ के रूप में पूजनीय भगवान श्री बिरसा मुंडा का भारत के इतिहास में एक विशिष्ट और प्रेरणादायी स्थान है। उनका आंदोलन केवल औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष नहीं था, बल्कि वह सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक संस्थाओं और स्वदेशी जीवन-पद्धति की रक्षा का एक सशक्त प्रयास था। उन्होंने उस कठिन समय में जनजातीय समुदाय के भीतर आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक चेतना का नया संचार किया जब वे भारी आर्थिक शोषण और परंपराओं के क्षरण का सामना कर रहे थे।
पर्यावरण संकट के दौर में बेहद प्रासंगिक है जनजातीय ज्ञान
भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत का उल्लेख करते हुए श्री विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि जनजातीय समुदायों के पास मौखिक साहित्य, संगीत, कला और पारिस्थितिक ज्ञान (Ecological Knowledge) की अद्भुत धरोहर है। ये परंपराएं आज भी भारत की सामाजिक संरचना को समृद्ध बना रही हैं। जनजातीय समाज लंबे समय से वनों और जैव-विविधता के संरक्षक रहे हैं। आज के इस दौर में, जब पूरी दुनिया गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है, तब प्रकृति के साथ जीने का उनका यह ज्ञान-तंत्र और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
इतिहास के मुख्यधारा विमर्श में मिले उचित स्थान
विधानसभा अध्यक्ष ने इस बात पर चिंता जताई कि देश के लिए इतने महत्वपूर्ण योगदानों के बावजूद, दशकों तक अनेक जनजातीय इतिहासों और उनके स्वतंत्रता संग्रामों को मुख्यधारा के विमर्श में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करने, ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाने और उनकी धरोहरों के दस्तावेजीकरण के प्रयासों का स्वागत किया। श्री गुप्ता ने कहा कि ये कदम भारत के इतिहास की अधिक समावेशी (Inclusive) समझ विकसित करने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण हैं।
संग्रहालय केवल कलाकृतियों के भंडार नहीं, सामूहिक स्मृति के संरक्षक हैं
संग्रहालयों (Museums) की भूमिका पर विशेष बल देते हुए श्री गुप्ता ने कहा कि संग्रहालय केवल प्राचीन वस्तुओं को सहेजने की जगह नहीं हैं, बल्कि वे समाज की सामूहिक स्मृति के संरक्षक हैं। संग्रहालयों में जनजातीय समुदायों का प्रतिनिधित्व केवल वस्तुओं के प्रदर्शन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके अनुभवों, आकांक्षाओं, ज्ञान-परंपराओं और राष्ट्रीय जीवन में उनके योगदान को भी सार्थक रूप से दिखाया जाना चाहिए। उन्हें इतिहास के निष्क्रिय पात्रों के रूप में नहीं, बल्कि भारत के विकास के सक्रिय सहभागी के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
विकसित भारत @2047 के लिए सांस्कृतिक आत्मविश्वास जरूरी
भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को दोहराते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि आर्थिक और तकनीकी प्रगति के साथ-साथ सांस्कृतिक आत्मविश्वास का होना भी बेहद आवश्यक है। जो राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक विरासत की उपेक्षा करता है, वह अपनी पहचान खोने का जोखिम उठाता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह संगोष्ठी जनजातीय धरोहर के संरक्षण और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी।











