तीस हजारी अदालत ने कानून के शासन को सर्वोपरि रखते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी शशांक नंदन भट्ट ने भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के वरिष्ठ अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल के खिलाफ पद के दुरुपयोग, जबरन छापेमारी और मारपीट के 25 साल पुराने मामले में सीबीआई के तत्कालीन जॉइंट डायरेक्टर रामनीश गीर और दिल्ली पुलिस के सेवानिवृत्त एसीपी वी.के. पांडेय को दोषी करार देते हुए तीन महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई है। मामला 19 अक्टूबर 2000 की सुबह का है, जब सीबीआई की एक टीम सुबह करीब 5:30 बजे अशोक कुमार अग्रवाल के आवास पर पहुंची थी। अधिकारियों ने न केवल घर का मुख्य दरवाजा तोड़कर जबरन प्रवेश किया, बल्कि शिकायतकर्ता के साथ मारपीट की और उनके परिवार के सदस्यों को बंधक बना लिया। जांच में यह तथ्य सामने आया कि यह कार्रवाई किसी कानूनी प्रक्रिया के तहत नहीं, बल्कि पेशेवर रंजिश और ‘दुर्भावनापूर्ण इरादे’ के साथ की गई थी। अधिकारियों ने शिकायतकर्ता को अपर्याप्त कपड़ों में बेहद गरिमाहीन तरीके से गिरफ्तार किया था, ताकि उन्हें अपमानित किया जा सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह छापेमारी केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के उस आदेश को निष्प्रभावी करने के लिए की गई थी, जिसमें श्री अग्रवाल के निलंबन की समीक्षा का निर्देश दिया गया था।
सुनवाई के दौरान अभियुक्तों ने तर्क दिया कि वे केवल आय से अधिक संपत्ति की जांच में अपना कर्तव्य निभा रहे थे, जिसे अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया। न्यायाधीश ने इसे आपराधिक अतिचार (क्रिमिनल ट्रेसपास) की श्रेणी में रखते हुए धारा 323, 427 और 448 आईपीसी के तहत दंडित किया है। कारावास के साथ-साथ दोनों दोषियों पर 50,000 रुपये प्रति व्यक्ति का जुर्माना भी लगाया गया है, जिसे 30 दिनों के भीतर पीड़ित को मुआवजे के रूप में प्रदान करना होगा।
पीड़ित पक्ष के वकील शुभम असरी ने मीडिया को संबोधित करते हुए क्या कहा
2026-04-28


