नई दिल्ली, 26 मई 2026 । फरीदाबाद की 65 वर्षीय महिला ने दिल्ली के निजी अस्पताल में पहला बाईलेटरल लंग ट्रांसप्लांट कराने के बाद स्वस्थ जीवन का एक साल पूरा कर लिया है। यह दिल्ली-एनसीआर में लंग ट्रांसप्लांट केयर के क्षेत्र में मील का पत्थर है।
एक साल पहले महिला स्क्लेरोडर्मा नामक ऑटोइम्यून विकार के कारण अंतिम चरण की इंटरस्टिशियल लंग डिज़ीज़ से जूझ रही थीं। उनके फेफड़े गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके थे। उन्हें हर मिनट 4-5 लीटर ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती थी। खराब फेफड़ों के कारण चलना-फिरना और बातचीत करना भी मुश्किल हो गया था। लगातार इलाज के बावजूद उनकी स्थिति बिगड़ती गई।

इसके बाद इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल, नई दिल्ली में उनका बाईलेटरल लंग ट्रांसप्लांट किया गया। यह दिल्ली के किसी प्राइवेट अस्पताल में पहला लंग ट्रांसप्लांट था। आज ट्रांसप्लांट को एक साल पूरे हो चुके हैं। अब उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत नहीं है। फिजियोथेरेपी, न्यूट्रिशनल केयर और काउंसलिंग के साथ उनका स्वास्थ्य लगातार बेहतर हो रहा है।
यह सर्जरी नोएडा के 48 वर्षीय ब्रेन-डेड मरीज के परिवार की उदारता से संभव हुई, जिन्होंने अंगदान का फैसला किया। अपोलो की टीम ने तेजी से काम करते हुए सात घंटे की ट्रांसप्लांट प्रक्रिया पूरी की। इस दौरान मरीज को एक्मो सपोर्ट पर रखा गया। ट्रांसप्लांट के बाद रिकवरी लंबी थी। वेंटिलेटरी सपोर्ट, ट्रेकियोस्टोमी और 15 से अधिक ब्रोंकोस्कोपी के बाद वे प्राकृतिक रूप से सांस लेने लगीं। धीरे-धीरे बाहरी सपोर्ट हटाया गया और कुछ हफ्तों में उनकी ताकत लौट आई।
लंग ट्रांसप्लांट चिकित्सा की सबसे जटिल प्रक्रियाओं में से एक है। दान किए गए फेफड़ों में से केवल 15-20% ही ट्रांसप्लांट योग्य होते हैं। वहीं 25-30% मरीज फेफड़े मिलने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। ऑटोइम्यून समस्या और एडवांस्ड लंग फाइब्रोसिस से ग्रस्त इस उम्र की मरीज का एक साल स्वस्थ रहना, डोनर अंग मिलने से लेकर महीनों के रिहैबिलिटेशन तक हर चरण में बेहतरीन तालमेल को दर्शाता है।
डॉ. मुकेश गोयल, सीनियर कंसल्टेंट, कार्डियोथोरेसिक सर्जरी, इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल ने कहा, “इस मामले ने दिल्ली-एनसीआर में मरीजों की उम्मीदें बदल दी हैं। पहले लंग ट्रांसप्लांट के लिए चेन्नई या हैदराबाद जाना पड़ता था। अब NOTTO से मान्यता मिलने के बाद अपोलो दिल्ली में भी यह संभव है। हमारा फोकस लंबे समय तक बेहतर नतीजे देने वाले प्रोग्राम पर है। मरीज का एक साल स्वस्थ रहना इसी दिशा में बड़ी उपलब्धि है।”
डॉ. अवधेश बंसल, सीनियर कंसल्टेंट, रेस्पिरेटरी मेडिसीन, इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल ने कहा, “लंग ट्रांसप्लांट अन्य अंगों के मुकाबले अधिक जटिल है। बाईलेटरल लंग ट्रांसप्लांट के बाद एक साल पूरा करना बड़ी उपलब्धि है, खासकर इस जटिल केस में। जब मरीज आईं तो उनके फेफड़े तेजी से खराब हो रहे थे और वे लगातार ऑक्सीजन पर थीं। आज उनका स्वस्थ जीवन मल्टीडिसिप्लिनरी केयर और निरंतर रिहैबिलिटेशन की भूमिका को प्रमाणित करता है।”






